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खरगोश And कछुआ – रफ्तार से आगे की रेस

खरगोश And कछुआ – रफ्तार से आगे की रेस
Traveller

Traveller

6mo ago · 3 min read

Let's explore the world 🌎

🐇जंगल में एक खरगोश रहता था—नाम था Hoppy। पूरे जंगल में उसकी रफ्तार की मिसाल दी जाती थी।जब वह दौड़ता, हवा भी पीछे छूट जाती।उसे अपनी स्पीड पर इतना भरोसा था कि किसी की चुनौती वह मज़ाक में उड़ा देता था।
एक दिन धीरे-धीरे चलने वाला कछुआ Toru उसके पास आया और बोला,“चलो Hoppy, एक रेस करते हैं।”
Hoppy पहले तो हँसा—“तू? मुझसे? रेस? ये तो मज़ेदार होगा!”
रेस शुरू हुई, और Hoppy पलक झपकते ही बहुत आगे निकल गया।अहंकार ने उसके कानों में फुसफुसाया—“इतना धीमा कछुआ क्या ही करेगा… चल थोड़ी देर आराम करते हैं।”
वह एक पेड़ के नीचे लेट गया और आँखें बंद कर लीं।पर जब उसने आँखें खोलीं—तो Toru फ़िनिश लाइन पार कर चुका था।
Hoppy के कान झुक गए…दिल में टीस उठी—“मैं तेज़ था, फिर भी हार गया?क्या सिर्फ़ रफ्तार काफी नहीं?”
उस दिन पहली बार उसके भीतर ‘क्यों?’ का सवाल जगा।
Hoppy हार नहीं मानना चाहता था।वह और तेज़ दौड़ने की प्रैक्टिस करने लगा—सुबह-शाम, धूप-छाँव में, झाड़ियों पर कूद-कूदकर।पर उसके अंदर कहीं अहंकार अभी भी बैठा था।वह खुद से ही बोलता,“अब Toru मुझे कभी नहीं हरा पाएगा!”
दूसरी रेस हुई।Toru अपनी स्थिर चाल से चलता रहा—न तेज़, न धीमा, बस लगातार।Hoppy अपनी तेजी में फिर बेपरवाह हो गया।पानी पीने को रुक गया… सोचा, “ये तो अभी तक बहुत पीछे होगा।”
लेकिन वही गलती दोहराई।Toru ने फिर जीत लिया।
Hoppy को खुद से नफरत होने लगी।उसने हवा में मुट्ठी भिंचकर कहा—“तेज़ हूँ, पर जीत नहीं पाता… क्यों?”
धीरे-धीरे उसे समझ आया—गति शरीर की होती है,पर जीत मन की स्थिरता से मिलती है।
अब उसके अंदर की रेस शुरू हो चुकी थी।हर दिन वह खुद से लड़ता—कभी अहंकार से,कभी हताशा से,कभी हार के डर से।
कई बार वह गिरता, कई बार टूटता,पर हर बार उठता और कहता—“असली दौड़ वो नहीं जो सब देख रहे हैं…असली दौड़ मेरे अंदर है।”
और यही उसकी सबसे बड़ी सीख बनने लगी।
आख़िरकार वह दिन आया जब Hoppy और Toru एक बार फिर आमने-सामने खड़े हुए।लेकिन इस बार Hoppy शांत था—ना घमंड, ना जल्दबाज़ी, ना डर।
उसने Toru की तरफ देखा और मुस्कुराया।Toru ने भी सिर हिलाकर कहा—“इस बार रेस अपने भीतर जीतना।”
रेस शुरू हुई।Hoppy ने अपनी रफ्तार पर नहीं, अपने संतुलन पर ध्यान दिया।धीरे-धीरे, समझदारी से… हर कदम सोचकर।
और पहली बार—Hoppy ने दौड़ते हुए खुद को महसूस किया,न कि अपने सामने वाले को।
दोनों लगभग साथ-साथ फ़िनिश लाइन पार कर गए।Toru मुस्कुराया।Hoppy ने आँखें बंद कर संतोष से कहा—
“अब समझ आया…रफ्तार शरीर की ताकत है,पर स्थिरता आत्मा की।”
और उस दिन Hoppy ने जीत से भी बड़ी चीज़ हासिल कर ली—संतुलन, समझ और खुद पर विजय।
“रफ़्तार से क्या होता है, मंज़िल तो सब्र वालों की है,ठहरकर भी जो चलते हैं… जीत उनकी मिसालों की है।”
“जीत वही जिसकी रूह मज़बूत हो,इरादे हों बुलंद, चाहे रफ्तार थोड़ी कम हो।”
------ कहानी का सार: --------“जीत मंज़िल तक पहुँचने में नहीं होती,हर हार के बाद फिर उठने में होती है।”
अगर चाहें, मैं इसे बच्चों के लिए छोटा सा नैतिक-प्रसंग या एनिमेटेड वीडियो स्क्रिप्ट में भी बदल सकता हूँ।

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