एक बार एक शहर में रहने वाला लड़का अपने गाँव गया।
शहर की तेज़ ज़िंदगी में उसे बस भागना आता था — काम, मोबाइल, और भीड़।
गाँव पहुँचते ही सब कुछ अलग था।
सुबह की हवा शांत थी,
लोग धीरे-धीरे मुस्कुरा कर बात कर रहे थे,
और एक बूढ़ा आदमी पेड़ के नीचे बैठा कुछ लकड़ी तराश रहा था।
लड़के ने जिज्ञासा से पूछा,
“दादा, आप यहाँ इतने शांत कैसे रहते हो? शहर जैसा कुछ भी नहीं है यहाँ।”
दादा ने बिना जल्दी किए जवाब दिया,
“शांति बाहर नहीं होती, बेटा… अंदर होती है।”
लड़का थोड़ा हँसा,
“पर यहाँ तो न कोई तेज़ लाइफ है, न कोई बड़ा फ्यूचर।”
दादा ने मुस्कुराकर उस लकड़ी की तरफ देखा और बोले,
“तुम्हें लगता है ये पेड़ बस यूँ ही खड़ा है?
इसकी जड़ें जितनी गहरी होंगी, ये उतना ही मजबूत होगा।”
फिर उन्होंने आगे कहा,
“संस्कृति भी ऐसी ही होती है।
अगर इंसान अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, तो चाहे वह कहीं भी चला जाए, टूटता नहीं।”
लड़का चुप हो गया।
पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसकी भागती ज़िंदगी में कुछ खो सा गया है।
शाम को जब वह वापस लौट रहा था,
तो गाँव की वो शांत हवा अब उसे भारी नहीं लग रही थी…
बल्कि सुकून दे रही थी।
और उसने मन ही मन सोचा —
“शायद असली ताकत आगे बढ़ने में नहीं,
बल्कि अपनी जड़ों को याद रखने में है।” 🌿

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