एक यात्रा ऐसी भी... 116 साल की उम्र में 3550 सीढ़ियां!
उम्र सिर्फ एक संख्या है — यह बात हम अक्सर सुनते हैं, पर शायद ही कभी इतनी गहराई से महसूस करते हैं जितना जुलाई 2026 में तिरुमला की पहाड़ियों पर देखने को मिला। कर्नाटक की एक 116 वर्षीय दादी माँ ने वह कर दिखाया जो अच्छे-खासे युवा भी सोचकर हिम्मत हार जाएं।
कौन हैं ये अद्भुत दादी माँ?
इनका नाम नवनीथम्मा बताया जाता है, हालांकि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इन्हें लक्ष्मव्वा या भीमव्व के नाम से भी पुकारा गया है। कर्नाटक की रहने वाली यह बुजुर्ग महिला अपनी उम्र के 116वें साल में हैं — यानी एक सदी से भी ज़्यादा समय जी चुकी हैं।
9 किलोमीटर, 3550 सीढ़ियां, और एक अटूट विश्वास
दादी ने आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित शेषाचलम पहाड़ियों के 'अलिपिरी पैदल मार्ग' को चुना — यही वह रास्ता है जो श्रद्धालुओं को पैदल भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन तक ले जाता है। कुल मिलाकर करीब 9 किलोमीटर लंबा यह सफर और उसमें आने वाली 3550 सीढ़ियां, किसी युवा के लिए भी थकान भरी चुनौती हैं।
लेकिन दादी के पास दो ही सहारे थे — एक उनकी लाठी, और दूसरा परिवार के सदस्यों का हाथ। पूरे रास्ते उनकी ज़ुबान पर सिर्फ एक ही नाम था — "गोविंदा... गोविंदा..." उनकी यह भक्ति देखकर रास्ते में मौजूद युवा तीर्थयात्री भी ठिठक कर देखते रह गए।
जब वीडियो वायरल हुआ...
जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर फैला, पूरे देश में हलचल मच गई। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी और दादी के जज़्बे को सच्ची भक्ति की मिसाल बताते हुए इसे बेहद प्रेरणादायक बताया।
मंदिर प्रशासन की खास पहल
वीडियो पर संज्ञान लेते हुए तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के अध्यक्ष ने तुरंत अधिकारियों को दादी और उनके परिवार को खोजने के निर्देश दिए। अधिकारियों ने उन्हें ढूंढ निकाला और सम्मानपूर्वक मंदिर ले जाकर विशेष VIP ब्रेक दर्शन की सुविधा दी। दर्शन के बाद वैदिक विद्वानों ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और मंदिर प्रशासन की तरफ से उन्हें रेशमी वस्त्र और भगवान का पवित्र लड्डू प्रसादम भेंट किया गया।
दिलचस्प तथ्य 🙏
- 116 साल की उम्र किसी औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा (life expectancy) से लगभग दोगुनी है।
- अलिपिरी मार्ग की 3550 सीढ़ियां चढ़ने में स्वस्थ युवा श्रद्धालुओं को भी आमतौर पर 3-4 घंटे लग जाते हैं।
- तिरुमला मंदिर दुनिया के सबसे ज़्यादा विज़िट किए जाने वाले धार्मिक स्थलों में गिना जाता है — रोज़ाना औसतन 50,000-60,000 श्रद्धालु यहां दर्शन करते हैं।
- "गोविंदा" का जाप तिरुमला की सीढ़ियां चढ़ते समय एक परंपरा जैसा बन चुका है, जो श्रद्धालुओं को थकान भूलने में मदद करता है।
सीख क्या मिलती है?
यह कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की धार्मिक यात्रा नहीं है — यह इच्छाशक्ति, आस्था और संकल्प की जीती-जागती मिसाल है। जब मन में सच्ची श्रद्धा हो, तो शरीर की उम्र और कमज़ोरी भी रास्ते की रुकावट नहीं बन पाती।
कभी-कभी असली प्रेरणा किसी किताब या भाषण में नहीं, बल्कि ऐसी ही किसी साधारण सी दिखने वाली दादी की चुपचाप चढ़ी हुई सीढ़ियों में छुपी होती है।





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