शाम के छह बज रहे हैं। लखनऊ के हज़रतगंज चौराहे पर एक ठेले की कड़ाही में तेल बुलबुले छोड़ रहा है, और उसी आवाज़ के साथ मेरी नोटबुक खुलती है। कोई बड़ी बात नहीं, बस एक समोसा है — लेकिन जब मैं उसका नंबर लिखती हूँ, तो हाथ काँपता है।
लिखना ज़िम्मेदारी है
मैंने पंद्रह साल की उम्र में पहली बार किसी ठेले का नाम नोटबुक में लिखा था। उसके बाद से एक नियम बन गया: कोई भी समोसा, चाहे वह कितना ही मशहूर क्यों न हो, बिना तीन बार खाए नहीं लिखा जाता। पहली बार: भूख। दूसरी बार: ध्यान। तीसरी बार: ईमानदारी। अब मुझे समझ आता है कि यह नियम समोसे के लिए नहीं, मेरे लिए था।
एक ठेले का गणित
हज़रतगंज के उस ठेले पर समोसा बारह रुपये का है। पिछले साल यही समोसा दस रुपये का था। दो रुपये का फ़र्क़ क्या है? उस ठेले वाले भैया ने मुझे बताया — आलू महँगा हो गया, तेल महँगा हो गया, पर ग्राहक वही हैं। वह कहते हैं, “मैं कीमत बढ़ा दूँ, पर मेरी चटनी का स्वाद नहीं बढ़ेगा।” यही बात मैंने नोटबुक में लिखी थी — कि स्वाद और कीमत का रिश्ता हमेशा सीधा नहीं होता।
तीन लोग, तीन स्वाद
एक ही ठेले के समोसे तीन अलग लोगों को तीन तरह लगते हैं। एक रिक्शेवाला भैया कहते हैं, “तेल ठीक है।” पास की दुकान की लड़की कहती है, “मसाला कम है।” और मेरे साथ खड़े एक बुज़ुर्ग कहते हैं, “पहले जैसा स्वाद नहीं रहा।” अब सच कौन बता रहा है? मेरे लिए सच यह है कि तीनों सही हैं — क्योंकि स्वाद यादों से बनता है, और हर किसी की याद अलग होती है।
समोसा और दर्शन
अगर आप सोचें कि यह सब समोसे के बारे में है, तो फिर से सोचें। यह उस आदत के बारे में है जिसमें हम किसी छोटी चीज़ को ध्यान से देखते हैं, उसे नाम देते हैं, और फिर उसे दूसरों तक पहुँचाते हैं। मेरे लिए, हर समीक्षा एक वादा है — कि मैं झूठ नहीं बोलूँगी, चाहे वह समोसा कितना ही प्रसिद्ध हो।
आख़िरी बात, बिना नैतिकता के
कल फिर छह बजे, वही चौराहा, वही कड़ाही। मेरी नोटबुक में अगला पन्ना खाली है, और मुझे पता है कि उस पर क्या लिखा जाएगा — एक नंबर, एक कीमत, और एक वाक्य जो सिर्फ़ उस शाम का सच होगा।



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