सुबह के तीन पन्ने
मेरी मेज़ पर एक नोटबुक हमेशा खुली रहती है। सुबह चाय से पहले, मैं तीन पन्ने भरती हूँ। कुछ भी — बकवास, अधूरे विचार, कल का बचा हुआ गुस्सा। यह क्रिएटिविटी का कोई जादुई नुस्खा नहीं है। यह सिर्फ़ एक आदत है, जो मुझे खाली दिमाग़ से भरने के बजाय भरे दिमाग़ को खाली करना सिखाती है।
क्रिएटिविटी का मतलब
हम सोचते हैं कि क्रिएटिव होने के लिए किसी बड़े आइडिया की ज़रूरत है। लेकिन सच यह है कि क्रिएटिविटी रोज़मर्रा की छोटी चीज़ों में छिपी होती है। जैसे दिल्ली में मेट्रो का सफर। भीड़, शोर, और फिर अचानक किसी के हाथ से गिरी हुई किताब। उस पन्ने पर लिखा एक वाक्य, जो आपके दिमाग़ में घर कर जाता है। वही वाक्य आगे चलकर आपकी कहानी का बीज बन सकता है।
एक ठोस भारतीय उदाहरण
पिछले हफ़्ते मैं दिल्ली के राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर खड़ी थी। भीड़ में एक लड़का अपनी नोटबुक में कुछ लिख रहा था। मैंने पूछा, "क्या लिख रहे हो?" उसने कहा, "रोज़ का हिसाब।" फिर हँसा और बोला, "तीन पन्ने। सुबह के।" मुझे अपनी नोटबुक याद आ गई। उस दिन मैंने भी तीन पन्ने भरे — मेट्रो में खड़े-खड़े। क्रिएटिविटी के लिए महंगी किताबें नहीं, बस एक ₹40 की नोटबुक और थोड़ी हिम्मत चाहिए।
कैसे शुरू करें
अगर आप भी क्रिएटिव बनना चाहते हैं, तो कल सुबह उठकर तीन पन्ने भरिए। कोई विषय नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। बस लिखिए। शुरुआत में बकवास ही लगेगा, लेकिन कुछ हफ़्तों बाद आपको अपने ही विचारों में एक नई आवाज़ सुनाई देगी। वही आवाज़ आपकी क्रिएटिविटी है।
क्रिएटिविटी कोई प्रतिभा नहीं, एक अभ्यास है। और अभ्यास रोज़ होता है, कभी-कभार नहीं।





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