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बच्चे का पहला सवाल और माँ की थकी आवाज़

बच्चे का पहला सवाल और माँ की थकी आवाज़
Rajesh Saxena

Rajesh Saxena

1d ago · 3 min read

Musicians understand things that cannot be said any other way.

शाम के छह बजकर बीस मिनट। इंदौर के एक फ्लैट में माँ रसोई में है, कड़ाही में ज़ीरा तड़क रहा है। सात साल का बेटा दरवाज़े पर खड़ा है और पूछता है — माँ, चींटी को कैसे पता चलता है कि रास्ता कहाँ मुड़ता है?

माँ कड़छी से हलचल करती है और कहती है — बाद में बताऊँगी, अभी खाना बन रहा है।

यही वह जगह है जहाँ से मेरी बात शुरू होती है।

सवाल टलता नहीं, रुकता है

बच्चा सवाल पूछता है और हम कह देते हैं बाद में। बाद में कभी नहीं आता। बच्चा तीन बार पूछता है, चौथी बार नहीं पूछता। वह मान लेता है कि यह सवाल पूछने की चीज़ नहीं है।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि हमने जवाब नहीं टाला — हमने पूछने की आदत टाल दी। और पूछने की आदत एक बार चली जाए तो दस साल बाद वापस नहीं आती। तब बच्चा बड़ा हो जाता है और उसके सवाल किताबों में, दोस्तों में, मोबाइल में चले जाते हैं।

रसोई से बेहतर जवाब नहीं मिलता

मैंने एक बात नोटिस की। जो सवाल रसोई में पूछा जाता है, उसका जवाब वहीं मिल सकता है। चींटी का रास्ता — उँगली से आटे की सफ़ेद लकीर खींच दो और चींटी को उस पर चलने दो। वह भटकती है, फिर अपना रास्ता ढूँढ लेती है। बच्चा दो मिनट में समझ जाता है, बिना किसी विज्ञान की किताब के।

ज़रूरी नहीं कि हर सवाल का जवाब हमें आता हो। बच्चा जब पूछे कि चाँद दिन में क्यों नहीं दिखता, तो यह कहना ठीक है — मुझे नहीं पता, चलो दोनों मिलकर देखते हैं। यह जवाब देने से भी बड़ा काम करता है। बच्चा सीखता है कि न जानना शर्म की बात नहीं है।

एक ऑफिस की मिसाल

मेरे एक जानने वाले पुणे में सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते हैं। उनकी बेटी ने एक रात पूछा कि आप ऑफिस में क्या करते हो। उन्होंने कहा — बैठकर कुछ लिखता हूँ, कुछ लोगों से बात करता हूँ। बेटी संतुष्ट नहीं हुई। अगले दिन उन्होंने उसे अपने ऑफिस की तस्वीर दिखाई — उनकी मेज़, स्क्रीन पर खुली फ़ाइल, कॉफ़ी का कप, बगल में साथी की कुर्सी। बेटी ने दो मिनट देखा और कहा — अच्छा, तो आप यहाँ बैठकर कहानियाँ ठीक करते हो।

वह बच्ची अब समझती है कि पिता का दिन कैसा होता है। यह जानकारी किसी स्कूल की किताब में नहीं थी।

छोटी आदत, बड़ा फ़र्क़

  • सवाल आए तो कहें — अच्छा सवाल है, दो मिनट रुक।
  • जवाब न आता हो तो झूठ न बोलें। कहें — मुझे नहीं पता, चलो ढूँढते हैं।
  • हफ़्ते में एक बार बच्चे को अपनी जगह दिखाएँ — दफ़्तर, बाज़ार, रसोई का कोना।

रसोई में कड़ाही अब भी गरम है। माँ ने आँच धीमी की और कहा — चींटी को पता होता है क्योंकि वह अपने पैरों से खुशबू छोड़ती जाती है। बेटा सुनकर चुप। फिर बोला — तो वह खो जाए तो वापस आ सकती है?

माँ ने कड़छी रख दी।

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