रात के करीब बारह बज रहे थे।
शहर की आखिरी रोशनी भी पीछे छूट चुकी थी। सड़क अब सुनसान थी। दोनों तरफ घना जंगल था और बीच से निकलती काली सड़क ऐसी लग रही थी, जैसे किसी अनजान दुनिया की ओर जा रही हो।
अमन अपनी कार में अकेला था।
उसे बस इतना पता था कि उसे सुबह होने से पहले पहाड़ों के उस पार बसे एक छोटे-से गांव तक पहुंचना है।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि उस रात उसकी यात्रा सिर्फ एक जगह तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी...
वह एक ऐसे यात्री की यात्रा बनने वाली थी, जो शायद इस दुनिया का था ही नहीं।
सुनसान सड़क पर वह मुलाकात
रात के करीब 12:40 बजे अमन ने देखा कि सड़क के किनारे एक आदमी खड़ा है।
सफेद कपड़े।
झुका हुआ सिर।
हाथ में एक पुराना बैग।
अमन ने कार धीमी कर दी।
आदमी ने हाथ उठाकर लिफ्ट मांगी।
पहले तो अमन ने सोचा कि इतनी रात को किसी को अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा। उसने कार रोक दी।
"कहां जाना है?" अमन ने पूछा।
आदमी ने धीरे से सिर उठाया।
उसकी आंखें अजीब तरह से शांत थीं।
"बस आगे... पुराने पुल तक।"
अमन ने दरवाजा खोल दिया।
वह आदमी पीछे की सीट पर बैठ गया।
दरवाजा बंद हुआ।
और उसी क्षण कार के अंदर अचानक ठंड बढ़ गई।
इतनी ठंड कि अमन की सांस से धुआं निकलने लगा।
उसने AC बंद किया।
फिर भी ठंड कम नहीं हुई।
वह यात्री कुछ अजीब था
कुछ किलोमीटर तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।
अमन ने शीशे में पीछे देखा।
वह आदमी खिड़की के बाहर देख रहा था।
"आप इतनी रात को यहां क्या कर रहे हैं?" अमन ने पूछा।
कोई जवाब नहीं।
अमन ने फिर पूछा।
इस बार आदमी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—
"मैं अपनी यात्रा पूरी करने जा रहा हूं।"
"कहां?"
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद जवाब आया—
"जहां से मेरी यात्रा शुरू हुई थी।"
अमन को यह जवाब अजीब लगा।
लेकिन उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
पुराना पुल
करीब बीस मिनट बाद सामने एक पुराना पुल दिखाई दिया।
पुल के पास पहुंचते ही उस आदमी ने कहा—
"यहीं रोक दो।"
अमन ने कार रोक दी।
पीछे मुड़कर देखा तो सीट खाली थी।
वह घबरा गया।
दरवाजा बंद था।
खिड़कियां बंद थीं।
फिर वह आदमी गया कहां?
अमन ने कार से उतरकर चारों तरफ देखा।
सड़क पर दूर-दूर तक कोई नहीं था।
तभी उसकी नजर पुल की रेलिंग पर पड़ी।
वहां एक छोटा-सा पुराना बोर्ड लगा था।
अमन उसके पास गया।
बोर्ड पर लिखा था—
"इस पुल पर रात के समय रुकना मना है।"
नीचे एक तारीख लिखी थी।
17 अक्टूबर 1998
अमन का दिल अचानक तेज धड़कने लगा।
एक पुरानी तस्वीर
उसी समय उसकी नजर पुल के नीचे पड़ी।
वहां एक टूटा हुआ पत्थर था।
पत्थर पर किसी ने नाम लिखा था—
"विवेक शर्मा
1975–1998"
अमन कुछ पल तक उस नाम को देखता रहा।
उसे अचानक पीछे से आवाज सुनाई दी।
"आप मुझे यहां तक छोड़ने आए थे..."
अमन ने पलटकर देखा।
वही आदमी उसके पीछे खड़ा था।
लेकिन इस बार उसके कपड़े गीले थे।
चेहरे पर पानी की बूंदें थीं।
और उसकी आंखें...
आंखें बिल्कुल खाली थीं।
अमन पीछे हट गया।
"आप... कौन हैं?"
आदमी मुस्कुराया।
"जिसे तुम अभी तक यात्री समझ रहे थे।"
सच सामने आया
उस आदमी ने धीरे-धीरे अपनी कहानी बताई।
साल 1998 में वह इसी रास्ते से अपने घर लौट रहा था।
बारिश बहुत तेज थी।
पुराना पुल कमजोर था।
उसकी कार पुल से नीचे नदी में गिर गई।
लोगों ने बहुत खोजा।
लेकिन उसकी लाश कई दिनों बाद मिली।
उसके बाद से हर साल उसी तारीख को...
एक सफेद कपड़ों वाला आदमी इस सड़क पर किसी वाहन को रोकता था।
और पुराने पुल तक लिफ्ट मांगता था।
अमन के हाथ-पैर कांपने लगे।
"लेकिन तुम मुझे ही क्यों मिले?"
वह आदमी कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
"क्योंकि आज मेरी यात्रा पूरी होनी थी।"
"इसका क्या मतलब?"
उसने नदी की तरफ देखा।
"पच्चीस साल से मैं इसी रास्ते पर लौट रहा था। मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो मुझे उस जगह तक पहुंचाए जहां मैं आखिरी बार जीवित था।"
अमन कुछ समझ पाता, उससे पहले हवा तेज हो गई।
पेड़ों की शाखाएं जोर-जोर से हिलने लगीं।
और अगले ही पल वह आदमी गायब हो गया।
सुबह का रहस्य
अमन पूरी रात वहीं नहीं रुका।
वह तेजी से गांव पहुंचा और सुबह होते ही वहां के एक बुजुर्ग से पूरी घटना बताई।
बुजुर्ग कुछ देर तक चुप रहे।
फिर उन्होंने अमन से पूछा—
"तुम्हें वह आदमी कैसा दिख रहा था?"
अमन ने उसका हुलिया बताया।
बुजुर्ग का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने अंदर जाकर एक पुराना फोटो एलबम निकाला।
एक तस्वीर अमन के सामने रख दी।
अमन की सांस रुक गई।
वह वही आदमी था।
वही चेहरा।
वही आंखें।
वही सफेद कपड़े।
फोटो के नीचे लिखा था—
विवेक शर्मा — 1998
अमन ने कांपती आवाज में पूछा—
"लेकिन यह फोटो तो 1998 की है..."
बुजुर्ग ने धीरे से कहा—
"हां। और आज 2026 है।"
कमरे में कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोशी छा गई।
फिर बुजुर्ग बोले—
"कहा जाता है कि वह हर साल किसी यात्री का इंतजार करता था। लेकिन पहली बार किसी ने उसे पुल तक पहुंचाया है।"
आखिरी सवाल
अमन ने उस दिन के बाद कभी उस रास्ते पर रात में यात्रा नहीं की।
लेकिन उसकी कहानी का सबसे बड़ा रहस्य आज भी बाकी है।
कुछ दिनों बाद जब उसने अपनी कार की पिछली सीट साफ की, तो उसे वहां एक पुराना बैग मिला।
वही बैग...
जो उस रात उस आदमी के हाथ में था।
बैग के अंदर सिर्फ एक चीज थी—
एक पुरानी घड़ी।
घड़ी बंद थी।
उसकी सुइयां 12:40 पर रुकी थीं।
ठीक उसी समय...
जब अमन ने पहली बार उसे सड़क पर देखा था।
और घड़ी के पीछे सिर्फ तीन शब्द खुदे थे—
"यात्रा अभी बाकी है..."
उस दिन के बाद अमन ने कभी किसी अनजान यात्री को रात में अपनी कार में लिफ्ट नहीं दी।
क्योंकि उसे अब समझ आ चुका था—
हर यात्री मंज़िल तक पहुंचने के लिए सफर नहीं करता।
कुछ यात्री...
अपनी अधूरी यात्रा पूरी करने के लिए लौटते हैं।



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